Real love story “यह मेरी भाभी कभी हमारा मिलन नहीं होने देगी…”पूर्णिमा के स्वर में नफरत और छटपटाहट की एक ऐसी ठंडी लहर थी, जिसने रुद्रपुर के उस सुनसान सरकारी आवास के कमरे में सन्नाटे को और गहरा कर दिया। उसकी आँखें लाल थीं, जिनमें प्यार का कोई कोमल भाव नहीं, बल्कि अपनी हसरतों को पाने की एक खौफनाक ज़िद जल रही थी। Real love story
सामने बैठा विकास—उसका प्रेमी—उसे सांत्वना देने के बजाय उस ज़िद की आग में घी डाल रहा था। विकास ने पूर्णिमा की कांपती हथेलियों को अपने हाथों में लिया और बेहद नीची आवाज़ में फुसफुसाया, “पूर्णिमा, तुमने पाँच साल देवरिया के इस अस्पताल में अकेले काटे हैं। हमने हर रात साथ रहने के सपने देखे हैं। क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारे भाई और घरवाले सब जान जाएँ और हम हमेशा के लिए अलग हो जाएँ?” Real love story
“नहीं! कभी नहीं!” पूर्णिमा चीख पड़ी, लेकिन अगले ही पल उसने अपनी आवाज़ दबा ली। खिड़की के पार हल्की बारिश की बूंदे गिर रही थीं। उसने मुड़कर गलियारे की तरफ देखा, जहाँ उसकी भाभी—गुड़िया—अपनी पाँच महीने की गर्भावस्था की थकावट और अपनी तीन साल की मासूम बेटी ज्ञानवी को सुलाने के बाद शायद अभी-अभी गहरी नींद में सोई थी। Real love story
गुड़िया… जो इस घर में परिवार की मर्यादा और भरोसे की मिसाल थी। सहजनवां के अपने छोटे से गाँव से जब वह देवरिया अपनी ननद पूर्णिमा के पास आई थी, तो उसका मकसद सिर्फ इतना था कि अपनी गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में ननद की देखरेख में रह सके। उसे क्या पता था कि जिस ननद को वह अपने परिवार का अभिमान समझती थी, वही ननद उसके आने वाले बच्चे और उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी दुश्मन बन चुकी थी। Real love story

Real love story वो सच, जो गुनाह का कारण बना
बात कुछ हफ्ते पहले की थी। देवरिया के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में बतौर स्टाफ नर्स काम करने वाली पूर्णिमा का जीवन बाहर से जितना शांत और जिम्मेदार दिखता था, अंदर से उतना ही उलझा हुआ था। विकास के साथ उसका प्रेम संबंध कोई साधारण अफेयर नहीं था—वह एक ऐसा जुनून था जिसने पूर्णिमा के नैतिक विवेक को पूरी तरह मिटा दिया था।
विकास अक्सर देर रात पूर्णिमा के सरकारी आवास पर आता था। शुरुआत में सब कुछ छिपकर चल रहा था, लेकिन जब से गुड़िया वहाँ रहने आई, पूर्णिमा के लिए बंदिशें बढ़ गईं।
फिर एक रात, वह हादसा हो गया जिसे टाला जा सकता था।
गुड़िया को अचानक प्यास लगी थी। वह रात के करीब दो बजे रसोई की तरफ बढ़ी। हॉल से गुजरते समय उसने पूर्णिमा के कमरे का दरवाजा आधा खुला देखा। अंदर से आ रही फुसफुसाहट और अनजान साए को देखकर गुड़िया ठिठक गई। जब उसने रोशनी में विकास का चेहरा और पूर्णिमा की बाहों में उसकी मौजूदगी देखी, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
अगली सुबह, रसोई में चाय बनाते वक्त गुड़िया के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें थीं। उसने पूर्णिमा को अलग ले जाकर समझाने की कोशिश की। Real love story
“पूर्णिमा…” गुड़िया ने बड़े प्यार और थोड़ी सख्ती से कहा, “तुम पढ़ी-लिखी हो, अस्पताल में इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभालती हो। भैया अयोध्या में दिन-रात खून-पसीना बहा रहे हैं ताकि गाँव का घर चल सके। और तुम यहाँ यह सब कर रही हो? वह लड़का कौन है जो रात के अंधेरे में तुम्हारे कमरे में आता है?”
पूर्णिमा का चेहरा फक पड़ गया, लेकिन उसने तुरंत तेवर बदल लिए, “भाभी, आप अपने काम से काम रखिए। मेरी जिंदगी में दखल देने की जरूरत नहीं है।”
“यह दखल नहीं है पूर्णिमा,” गुड़िया ने अपनी गोद पर हाथ रखते हुए कहा, उसके आँखों में आँसू थे। “अगर माँ जी या तुम्हारे भैया को यह बात पता चली, तो पूरा परिवार बिखर जाएगा। मैं अपने पति से झूठ नहीं बोल सकती। अगर तुमने यह सब तुरंत बंद नहीं किया, तो मुझे चमन को सब बताना पड़ेगा।”
‘चमन को सब बताना पड़ेगा…’ यही वे शब्द थे जिन्होंने पूर्णिमा के दिमाग में एक खौफनाक हलचल पैदा कर दी। उसके लिए उसका अफेयर सिर्फ एक रिश्ता नहीं था, वह उसकी अपनी बनाई दुनिया थी, और गुड़िया उस दुनिया के दरवाजे पर कुंडी लगाने जा रही थी।

Real love story साज़िश की काली बुनावट
उसी शाम, पूर्णिमा ने विकास को बुलाया। दोनों ने अस्पताल के पीछे बने एक खाली क्वार्टर में मुलाकात की।
“वह चमन भैया को सब बता देगी, विकास!” पूर्णिमा बदहवास होकर बोली। “अगर गाँव में बात फैली, तो मेरी नौकरी, मेरी इज्जत… सब खत्म हो जाएगा। और सबसे बड़ी बात, घरवाले मेरी शादी कहीं और करा देंगे।”
विकास ने अपने चेहरे पर एक कठोर मुस्कान लाई। उसने पूर्णिमा के कंधे को कसकर पकड़ा, “तो फिर हमें उस रास्ते के रोड़े को ही हटा देना चाहिए, पूर्णिमा।”
“हटा देना चाहिए? मतलब?” पूर्णिमा की धड़कनें तेज हो गईं।
“हाँ। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। गुड़िया अगर नहीं रहेगी, तो किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। सब यही समझेंगे कि कोई हादसा हुआ या कोई पुरानी रंजिश थी।”
पूर्णिमा का दिल एक पल के लिए काँपा। गुड़िया सिर्फ उसकी भाभी नहीं थी, उसके पेट में उसके अपने भाई का खून पल रहा था। लेकिन प्यार का अंधा जुनून इंसान को राक्षस बना देता है।
“लेकिन यह सब होगा कैसे?” पूर्णिमा ने कांपती आवाज़ में पूछा।
“मेरे संपर्क में गोरखपुर का एक आदमी है—रामअशीष। सुपारी किलर है। काम सफाई से करता है। बस पैसा लगेगा।” विकास ने सीधा सौदा सामने रखा।
“कितना पैसा?”
“तीन लाख रुपये।”
तीन लाख रुपये… एक नर्स के लिए यह रकम छोटी नहीं थी, लेकिन उस वक्त पूर्णिमा की आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ था। उसके बैंक खाते में इतने पैसे तुरंत उपलब्ध नहीं थे। उसने अपनी अलमारी खोली, जहाँ उसकी माँ और उसने सालों से सहेज कर रखे सोने के गहने रखे थे—कंगन, चेन, और झुमके।
अगले ही दिन, पूर्णिमा देवरिया के एक स्थानीय सर्राफा व्यापारी के पास पहुँची। अपने ही गहनों को गिरवी रखकर उसने ढाई लाख रुपये नकद जुटाए। जब उसने वह नोटों से भरा पैकेट विकास के हाथों में सौंपा, तो उसकी उंगलियाँ काँप नहीं रही थीं। उसका ज़मीर मर चुका था।
“ढाई लाख रुपये एडवांस दे दिए हैं,” विकास ने फोन पर सुपारी किलर रामअशीष से बात करते हुए कहा। “बाकी के पचास हजार काम होने के बाद मिलेंगे।”
Real love story 24 अक्टूबर 2026 की वो खौफनाक रात
रात के 10:30 बज रहे थे। रुद्रपुर सीएचसी परिसर में सन्नाटा पसरा हुआ था। 24 अक्टूबर की रात की हवा में एक अजीब सी ठंडक थी।
पूर्णिमा के क्वार्टर की तीसरी मंजिल पर बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, लेकिन अंदर दो जिंदगियाँ जाग रही थीं—एक मासूमियत की नींद सोने की कोशिश कर रही थी, और दूसरी मौत का जाल बुन रही थी।
गुड़िया अपने कमरे में लेटी हुई थी। गर्भावस्था की वजह से उसे पीठ में दर्द रहता था। पूर्णिमा धीरे से उसके कमरे में आई। उसने बेहद मीठे स्वर में कहा, “भाभी, ज्ञानवी आज रो रही थी। आप आराम करो, मैं इसे अपने कमरे में सुला लेती हूँ। आपको नींद अच्छी आएगी।”
गुड़िया ने ननद की आँखों में झाँका। उसे लगा शायद पूर्णिमा का दिल बदल गया है, शायद वह अपनी गलती समझ गई है। गुड़िया ने एक हल्की मुस्कान के साथ अपनी तीन साल की बेटी ज्ञानवी को पूर्णिमा की गोद में सौंप दिया।
“थैंक यू, पूर्णिमा… तुम बहुत अच्छी हो,” गुड़िया ने धीमी आवाज़ में कहा और करवट बदल ली।
उसे क्या खबर थी कि यह उसकी जिंदगी के आखिरी शब्द थे।
रात के ठीक 11 बजे, पूर्णिमा ने चुपके से नीचे का मुख्य दरवाजा खोल दिया। बाहर अंधेरे में दो साए खड़े थे। रामअशीष और उसका साथी।
पूर्णिमा ने बिना एक शब्द बोले, अपनी उंगली से गुड़िया के कमरे की तरफ इशारा कर दिया। वह खुद ज्ञानवी को लेकर दूसरे कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया ताकि बच्ची की रोने की आवाज़ बाहर न आए और न ही बाहर का खौफनाक मंजर बच्ची देख सके।
रामअशीष और उसका साथी दबे पाँव गुड़िया के कमरे में दाखिल हुए। कुंडी अंदर से लगा दी गई।
गुड़िया अभी अधसोई हालत में थी कि अचानक उसे किसी के भारी कदमों की आहट हुई। इससे पहले कि वह चीख पाती या उठकर बैठ पाती, एक मजबूत और सख्त हाथ ने उसका मुँह भींच दिया।
“कौन… कौन हो तुम लोग?” गुड़िया की आवाज़ उसके गले में ही घुट कर रह गई।
रामअशीष के साथी ने एक मोटी सूती रस्सी गुड़िया के गले में डाल दी और दोनों सिरों को पूरी ताकत से खींच लिया। गुड़िया ने तड़पना शुरू किया। उसके हाथ-पाँव बिस्तर पर पटकने लगे। वह अपनी पाँच महीने की गर्भावस्था और अपने गर्भस्थ शिशु की रक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत से लड़ी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, वह अपनी ननद को पुकारना चाहती थी, लेकिन गले से केवल घुरघुर की आवाज़ निकल रही थी।
“जल्दी कर! काम खत्म कर!” रामअशीष ने फुसफुसाते हुए कहा।
जब रस्सी के दबाव से गुड़िया का तड़पना थोड़ा कम हुआ, तो रामअशीष ने अपने थैले से एक भारी लोहे की हथौड़ी निकाली। और फिर… एक, दो, तीन… सीधे गुड़िया के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर दिए।
कमरे की दीवार पर खून के छींटे उड़ गए। एक मासूम माँ और उसके अनजन्मे बच्चे की सांसें हमेशा-हमेशा के लिए थम गईं।
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हत्याकांड को अंजाम देने के बाद, दोनों किलर उसी अंधेरे का फायदा उठाकर फरार हो गए।
कुछ देर तक कमरे में मौत का सन्नाटा छाया रहा। फिर पूर्णिमा अपने कमरे से बाहर निकली। उसने गुड़िया के कमरे का दरवाजा खोला। खून से लथपथ बिस्तर और बेजान पड़ी भाभी को देखकर एक पल के लिए उसका अपना कलेजा कांप उठा, लेकिन स्वार्थ और डर ने तुरंत उस पर काबू पा लिया।
उसने अपने बाल बिखेरे, अपने कपड़े थोड़े अस्त-व्यस्त किए और फिर अपने ही फोन से पुलिस 112 पर कॉल किया।
“सर! बचाओ! मेरे घर में डाकू घुस आए हैं! मेरी भाभी को मार दिया… सब कुछ लूट लिया!” वह फोन पर जोर-जोर से रोने और चीखने का नाटक करने लगी।
कुछ ही देर में पुलिस की सायरन बजाती गाड़ियाँ सीएचसी परिसर में पहुँच गईं। रुद्रपुर थाना प्रभारी और खुद देवरिया के एसपी अभिजीत आर. शंकर रात में ही घटनास्थल पर पहुँचे।
कमरे का दृश्य वीभत्स था। गुड़िया का शव खून से लथपथ पड़ा था।
पूर्णिमा पुलिस के सामने बदहवास होने का नाटक कर रही थी। “सर, मैं दूसरे कमरे में बच्ची के साथ सो रही थी। अचानक कुछ आहट हुई, जब मैं बाहर आई तो दो लोग भाग रहे थे… उन्होंने मेरी भाभी का यह हाल कर दिया…”
सुबह होते-होते सहजनवां से गुड़िया का परिवार भी बदहवास हालत में देवरिया पहुँच गया। गुड़िया की माँ लालती देवी अपनी बेटी का शव देखकर दहाड़े मार-मारकर रोने लगीं।
“मेरी बेटी को इन लोगों ने मार डाला!” लालती देवी ने रोते हुए पुलिस के सामने आरोप लगाया। “शादी के बाद से ही ये लोग दहेज के लिए मेरी बेटी को ताने देते थे। चमनलाल, उसकी माँ उर्मिला, यह ननद पूर्णिमा, जेठ अभिमन्यु… इन सबने मिलकर मेरी बेटी को मार दिया!”
लालती देवी की तहरीर पर पुलिस ने तुरंत मामला दर्ज कर लिया। शुरुआती FIR में दहेज हत्या का केस बना, और पुलिस ने पूर्णिमा तथा उसके भाई चमनलाल समेत ससुराल के पाँच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर उन्हें हिरासत में ले लिया।
पूर्णिमा को लगा कि उसका प्लान कामयाब हो गया। पुलिस इसे दहेज हत्या या लूट का मामला मानकर जाँच करेगी और वह कुछ दिनों में छूट जाएगी। लेकिन कानून के हाथ लंबे होते हैं, और सच की अपनी एक अलग आहट होती है।
Real love story पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और शक की सुई
मामला हाईप्रोफाइल हो चुका था। एसपी अभिजीत आर. शंकर ने इस मामले की तह तक जाने के लिए एक विशेष टीम का गठन किया।
दो दिन बाद जब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आई, तो पुलिस के सामने कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:
गुड़िया की मौत का कारण गले पर पड़े रस्सी के निशान (Asphyxia due to strangulation) और सिर पर भारी वस्तु (हथौड़े) के प्रहार से हुआ ब्रेन हेमरेज था।
शरीर पर कोई अन्य संघर्ष के निशान नहीं थे, जिससे साफ था कि हमलावरों को घर के नक्शे और अंदर की स्थिति का पूरा ज्ञान था।
सबसे बड़ी बात—घर के किसी भी दरवाजे या खिड़की को जबरन तोड़ने (Forced Entry) के सबूत नहीं मिले थे। यानी दरवाजा अंदर से ही किसी ने खोला था।
पुलिस अधिकारी ने पूर्णिमा को दोबारा पूछताछ के लिए कमरे में बुलाया।
पूर्णिमा,” इंस्पेक्टर ने ठंडे स्वर में पूछा, “तुम कह रही हो कि लुटेरे आए थे। लेकिन घर से एक भी रुपया या गहना गायब नहीं है। और लुटेरे तीसरी मंजिल पर सीधे गुड़िया के कमरे में ही क्यों गए? तुम्हारे कमरे का दरवाजा बाहर से बंद क्यों नहीं किया?”
पूर्णिमा की पेशानी पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। “सर… सर, मुझे नहीं पता। मैं तो डर के मारे कमरे में छिपी थी।”
“और एक बात,” इंस्पेक्टर ने आगे झुकते हुए कहा, “तुम्हारी भाभी पाँच महीने की गर्भवती थी। अगर कोई लूट के इरादे से आता, तो वह सीधा सिर पर हथौड़ी से वार नहीं करता। यह हत्या लूट की नहीं, बल्कि बेहद निजी नफरत की है। और उस रात उस घर में सिर्फ तुम और गुड़िया थे।”
पुलिस ने पूर्णिमा के कॉल डिटेल्स (CDR) खंगाले। पिछले कुछ महीनों में एक ही नंबर से सैकड़ों बार बात हुई थी—वह नंबर था विकास का। और 24 अक्टूबर की रात को भी, वारदात से ठीक पहले और ठीक बाद में, पूर्णिमा और विकास के बीच कई बार छोटी-छोटी बातचीत हुई थी।

Real love story खौफनाक सच का कबूलनामा
पुलिस ने जब पूर्णिमा पर सख्ती बढ़ाई और विकास के साथ उसके कॉल रिकॉर्ड्स सामने रखे, तो पूर्णिमा का बनावटी ढाँचा ढह गया। वह फुट-फुटकर रोने लगी और अपने ही जुर्म का वो काला पन्ना खोल दिया जिसे सुनकर पुलिस अधिकारियों के भी रोंगटे खड़े हो गए।
“हाँ! मैंने ही मरवाया है गुड़िया को!” पूर्णिमा ने अपना सिर झुकाते हुए कबूल किया।
“क्यों? अपने ही भाई के घर को उजाड़ दिया तुमने? एक गर्भवती औरत की जान ले ली?” इंस्पेक्टर की आवाज़ में गुस्सा और घृणा साफ थी।
“वह मेरे और विकास के बीच में आ रही थी सर!” पूर्णिमा चिल्लाई, उसकी आँखों में पछतावे से ज्यादा पकड़े जाने का खौफ था। “उसने मुझे और विकास को साथ देख लिया था। वह धमकी दे रही थी कि भैया को सब बता देगी। अगर भैया को पता चलता, तो मेरी नौकरी छूट जाती, मेरी शादी कहीं और कर दी जाती। मैं विकास के बिना नहीं रह सकती थी। इसीलिए हमने योजना बनाई…”
“और पैसे कहाँ से आए सुपारी के?”
“तीन लाख में सौदा हुआ था। मेरे पास कैश नहीं था… तो मैंने अपने सोने के गहने गिरवी रखकर ढाई लाख रुपये जुटाए और विकास के जरिए शूटर को दिए थे। पचास हजार रुपये काम पूरा होने के बाद देने थे…”
एक सरकारी नर्स, जिसका काम लोगों की जान बचाना था, उसने अपनी हसरतों की बलिबेदी पर अपने ही परिवार के चिराग को चढ़ा दिया था।

Real love story आधी रात की मुठभेड़ और अंजाम
पूर्णिमा के कबूलनामे के बाद, पुलिस ने तुरंत विकास और सुपारी किलर रामअशीष की धरपकड़ के लिए जाल बिछाया।
सोमवार, 27 अक्टूबर 2026 की रात, पुलिस को गुप्त सूचना मिली कि मुख्य शूटर रामअशीष यादव, नर्स के प्रेमी विकास से सुपारी की बकाया रकम (50 हजार रुपये) लेने के लिए रुद्रपुर-गोरखपुर मार्ग के पास आने वाला है।
स्वाट टीम और स्थानीय पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर दी। रात के करीब 1:30 बजे, एक मोटरसाइकिल पर दो संदिग्ध आते दिखाई दिए। पुलिस ने उन्हें रुकने का इशारा किया, लेकिन बाइक सवारों ने पुलिस टीम पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं।
“पुलिस टीम पर फायर! पोजीशन लो!” स्वाट टीम के प्रभारी ने चिल्लाकर कहा।
दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं। जवाबी कार्रवाई में पुलिस की एक गोली मुख्य शूटर रामअशीष यादव के पैर में जा लगी। वह मोटरसाइकिल समेत नीचे गिर पड़ा, जबकि उसका साथी अंधेरे का फायदा उठाकर झाड़ियों की तरफ भाग निकला।
पुलिस ने घायल रामअशीष को तुरंत गिरफ्तार कर लिया और उसके पास से एक अवैध तमंचा, कारतूस और वारदात में इस्तेमाल की गई कुछ चीजें बरामद कीं।

Real love story : बिखरा हुआ परिवार और कानून का हथौड़ा
देवरिया पुलिस लाइन में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में एसपी अभिजीत आर. शंकर ने इस पूरी खौफनाक साजिश का पर्दाफाश किया।
“यह एक बेहद संवेदनहीन और योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया अपराध था,” एसपी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा। “एक स्टाफ नर्स, जिस पर समाज की सेवा का जिम्मा था, उसने अपने अवैध संबंधों को छिपाने के लिए अपनी ही गर्भवती भाभी की सुपारी देकर हत्या करवा दी।
मामले में प्रयुक्त गहने, गिरवी रखने के कागजात और सर्विलांस साक्ष्यों को जब्त कर लिया गया है। आरोपी नर्स पूर्णिमा, उसके प्रेमी विकास और शूटर रामअशीष को जेल भेजा जा रहा है। फरार आरोपी की तलाश जारी है।”
जब पूर्णिमा को पुलिस जीप में बैठाकर जेल ले जाया जा रहा था, तो बाहर उसका भाई चमनलाल खड़ा था। जिस भाई के लिए उसने अपनी भाभी की बलि दी थी, उसकी आँखों में ननद के लिए केवल नफरत और तिरस्कार था।
चमनलाल ने रोते हुए कहा, “मैंने तुझे अपनी छोटी बहन नहीं, अपनी बेटी माना था पूर्णिमा… तूने मेरी पत्नी को नहीं, मेरे आने वाले बच्चे को, मेरी पूरी जिंदगी को मार डाला।”
पूर्णिमा ने अपना चेहरा झुका लिया। उसके पास कोई जवाब नहीं था।
प्रेम, जब स्वार्थ और जुनून की हदें पार कर जाता है, तो वह किसी का सगा नहीं रहता। देवरिया की यह लालच और हवस की दास्तान हमेशा इस बात की गवाही देगी कि पाप का घड़ा चाहे कितना भी छुपाकर भरा जाए, एक दिन कानून की चौखट पर आकर फूटता जरूर है।
पूर्णिमा आज सलाखों के पीछे अपनी जिंदगी की बची-कुची रातें गिन रही है, जहाँ न उसका प्रेमी उसके साथ है, न उसका परिवार—पीछे छूट गई है तो सिर्फ एक मासूम की चीख और जिंदगी भर का पछतावा।
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